जनेऊ प्रथा
जनेऊ एक धार्मिक अनुष्ठान है। जिसको ब्राह्मण अपनी उच्चता और श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में लहराते है।
ब्राह्मण अपनी माँ बहन और बेटी को भी जनेऊ नहीं पहनाता ।वामन मेश्राम 👇
इक्कीसवीं शताब्दी में यह जनेऊ सामाजिक विषमता और भेदभाव का सब से ज्यादा प्रकट प्रतीक है। जनेऊ नहीं होगा, तो ब्राह्मण या ठाकुर को पहचाना कैसे जायेगा?
दुनिया में लोग अपने प्रयत्नों से श्रेष्ठता अर्जित करते हैं, पर हिंदू समाज में यह जन्म से ही उपार्जित हो जाती है। ब्राह्मण का बच्चा है तो वह स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ है, भले ही आगे चल कर वह अनपढ़, मूर्ख, असभ्य और दुष्ट निकले। श्रेष्ठता का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है?
इसी अर्थ में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि हिंदू समाज समाज नहीं, जातियों का समूह है। यह वह व्यवस्था है जिसमें बीस प्रतिशत से भी कम लोगों ने अपने को श्रेष्ठ और जनेऊ धारण करने का अधिकारी घोषित कर रखा है और बाकी अस्सी प्रतिशत को जन्म से ही हीन घोषित कर दिया है।
अपने विख्यात भाषण ‘जाति का विनाश ’ में डॉ. आंबेडकर कई उदाहरण देते हैं। एक उदाहरण यह है : ‘मराठों के देश में, ब्राह्मण पेशवाओं के शासन काल में अछूत को उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी जिस पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो, ताकि अछूत की छाया पड़ने से ब्राह्मण अपवित्र न हो जाये । उसके लिए आदेश था कि वह एक चिह्न या निशानी के तौर पर अछूत अपनी कलाई में या गले में काला धागा बाँधे रहे , ताकि कोई ब्राह्मण गलती से उससे छू जाने पर अपवित्र न हो जाये। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूत के लिए यह आदेश था कि अछूत कमर में झाड़ू बाँध कर चले, ताकि वह जिस मिट्टी पर पैर रखे, वह उसके पीछे से काम कर रहे इस झाड़ू से साफ हो जाये, ताकि उस मिट्टी पर पैर रखने से कोई ब्राह्मण अपवित्र न हो जाये। पूना में, अछूत के लिए जरूरी था कि वह जहाँ भी जाये, सभी अछूत अपने गले में मिट्टी की हाँड़ी बाँध कर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूके, ताकि जमीन पर पड़ी हुई अछूत की थूक पर अनजाने में किसी हिंदू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र न हो जाये।’
गुरु नानक ने जब जनेऊ पहनने से किया इनकार – BBC हिंदी -👇
http://www.bbc.com/hindi/india-41868258
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