सिक्खों के असली दुश्मन कौन है?? 👇
गुरु नानक जी ने क्यो किया ब्रह्मणो के जनेऊ प्रथा का विरोध 👇
गंगू ब्राह्मण का काला सच 👇
गुरु नानक के बारे में एक प्रसिद्ध कहानी है कि वो 11 साल की उम्र में ही विद्रोही हो गए थे. इस उम्र में हिन्दू लड़के पवित्र जनेऊ पहनना शुरू करते हैं, लेकिन गुरु नानक ने जनेऊ पहनने से इनकार कर दिया था .
उन्होंने कहा था कि लोगों को जनेऊ पहनने के मुक़ाबले अपने व्यक्तिगत गुणों को बढ़ाना चाहिए.
गुरु नानक जी ने बहुत छोटी आयु में यह समझ लिया था कि जातिप्रथा एक शोषणकारी व्यवस्था है। उस समय में जातिभेद चरम पर थाl ऐसे समय में गुरुनानक देव ने ऊँच-नीच को बढ़ावा देने वाली जातिभेद की दीवार को सिरे से ख़ारिज किया थाl उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया बल्कि पंडे-पुजारियों की भी आलोचना कीl
उस समय ब्राह्मणवाद को लताड़ने का साहस कबीर, रविदास, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी ही कर पा रहे थेl इसी का नतीजा था कि तमाम विरोध के बाद भी उन्होंने एक एससी(sc) वर्ग के व्यक्ति भाई लालो को अपना परम सहयोगी और मित्र चुना थाl
सिख धर्म में लंगर प्रथा जातिवाद खत्म करने के लिए ही शुरू की गई थी। ताकि सिख धर्म के सभी अनुयाइयों में बराबरी का एहसास हो और समानता की भावना मजबूत हो।
उनके दोहों में भी जातिभेद के विरोध की चेतना, मानवता, समानाता, आपसी भाईचारा और मानवप्रेम ही कलमबद्ध हुए हैं। उन्होंने कहा है-
“अव्वल अल्लाह नूर उपाया/कुदरत ते सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।”
गुरु नानक जी ने समस्त मानव जाति को एक ही कुदरत की संतान बताया और कहा कि एक ही पिता की संतान होने के बाद भला कोई ऊंच और कोई नीच कैसे हो सकता है।
वे कहते हैं –
‘ नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।’
यानी समाज में नीच जाति में भी जो सबसे ज्यादा नीच है,नानक उसके साथ खड़े हैं, बड़े लोगों के साथ मेरा क्या काम।
गुरुनानक ने न केवल जातिप्रथा का विरोध किया बल्कि वे समाज में प्रचलित सड़ी-गली मान्यताओं और कुरीतियों के भी घोर विरोधी रहेl
सिख गुरु गोबिन्द सिंह ने जातिवाद को खत्म करने के लिए अपने अनुयायियों को आदेश दिया था कि हर सिख पुरुष अपने नाम के आखिर में ‘सिंह’ लिखेगा तथा सिख महिलाएं ‘कौर’ लिखा करेंगीl लेकिन सिख धर्म को मानने वाले भी अपने गुरुओं की शिक्षाओं को भूल बैठे और ऊँच-नीच की भावना से बच नहीं सके। उन्होंने भी धीरे-धीरे ब्राह्मणवाद को अपना लियाl अब सिख अपने नाम के पीछे सेखों, खत्री, झंड , ढिल्लो, मेहता, भल्ला आदि सरनेम लगाकर खुद को तथाकथित ऊंच जाति की पृष्ठभूमि वाला, क्षत्रिय, जट आदि दिखने की अंधी होड़ में शामिल हो गए हैं। जो सच्चे सिख अनुयायी हैं वो आज भी जातिवाद को नहीं मानते।
गुरु ग्रन्थ साहिब में छुआछूत और उंच-नीच की जाति-पांति का कड़ा विरोध है. इस में सामाजिक-बराबरी और भाई-चारे का संदेश दिया गया है।
मूर्ति-पूजा, सती-प्रथा, कन्या-वध, पर्दा-प्रथा आदि का निषेध किया गया है।
गुरु ग्रन्थ साहिब में ईश्वर को निराकार,निरंजन, अकाल,अजन्मा और अविनाशी माना गया है.
गुरु का लंगर – सामाजिक गैर-बराबरी को ख़त्म करने के लिए लंगर की शुरुआत गुरु नानक ने की थी.यह व्यवस्था गुरु-दर-गुरु जारी रही और आज भी है. इसी लंगर से प्रभावित हो कर मुग़ल बादशाह अकबर ने कुछ गावं सिखों को जागीर में दिए थे जिस पर आज अमृतसर बसा है।
गुरुद्वारा आन्दोलन – आरम्भ में गुरुद्वारे भी हिन्दू मन्दिरों की तरह महंतों/पंडों की पैतृक सम्पत्ति समझे जाते थे. इसके विरोध में लम्बा आन्दोलन चला और गुरुद्वारों को सिक्ख संगत( समाज ) की सम्पत्ति बना दिया गया. इसके लिए निर्वाचित गुरुद्वारा प्रबंध समितियां बनायीं गयी।
ब्राह्मणवाद के विरुध्द जंग में गुरु नानक के साथ नीच करार की गयी जातियां चाहे हिन्दुओं में हो या मुसलमानों में, बराबर के साझीदार थी. मगर, बाद में हम देखते हैं कि जो जंग ब्राह्मणवाद के खिलाफ होनी थी, वह सिक्खों और मुसलमानों के बीच खड़ी हो गयी. मनुवादियों ने मुगलों के साथ रिश्ते जोड़ कर और गुरुओं पर हमले कर सिक्ख लहर को कमजोर किया.
गुरु अमरदास 3rd Guru : (1479-1574) –
सिक्खों के गुरु अमरदास ने हिन्दू-कर्मकांड और देवी-देवताओं को मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने छुआछूत और सती-प्रथा का भी विरोध किया था. उन्होंने अपने शिष्यों को राम के स्थान पर ‘वाहे गुरु ‘ का उद्घोष करने को कहा था.
गुरु रामदास 4rth Guru : (1534-1574) –
ये तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे. आपने हरमंदिर साहिब( स्वर्ण मन्दिर) की नीवं एक मुस्लिम संत मियां मीर से रखवाई थी. आपने हरमंदिर साहिब के चार दरवाजे रखवाए थे ताकि किसी भी जाति/ धर्म, समुदाय का व्यक्ति किसी भी दिशा से आ कर इबादत कर सके.
गुरु अर्जनदेव 5th Guru : (1563-1606) –
गुरु रामदास के पुत्र गुरु अर्जनदेव ने पूर्व गुरुओं की वाणी को ‘आदि ग्रन्थ’ के रूप में संकलित किया था. गुरु रामदास की हत्या लाहौर के ब्राह्मण राजा चंदूशाह ने करवाई थी.
गुरु तेग बहादुर 6th Guru : (1621-1675) –
कश्मीरी पंडितों ने औरंगजेब के आतंक से निजात पाने के लिए गुरु तेग बहादूर से गुहार की थी. इस से मुग़ल बादशाह औरंगजेब खपा थे. औरंगजेब ने उन्हें कैद कर बाद में हत्या करवा दी थी.दिल्ली के चांदनी चौक का गुरुद्वारा सिस गंज साहिब उनकी स्मृति में बनाया गया है जहाँ उनकी हत्या की गयी थी. गुर तेग बहादूर ने सन 1665 में आनंदपुर साहिब शहर बसाया था.
गुरुनानक देव जी हरिद्वार में 👇
सिख धर्म का ब्रह्मिकरण 👇
गुरुनानक देव जी और ब्राह्मणवाद
ब्राह्मणवाद के चार स्तम्भ