आरएसएस का भगवा ध्वज और राष्ट्रध्वज
🚩RSS Flag and Indian Flag🇮🇳
शायद यह जानकर बड़ा आपको धक्का लगेगा कि कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों या फिर वामियों ने नहीं बल्कि आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर पूरे 52 साल राष्ट्रध्वज नहीं फहराया .
राष्ट्रध्वज आरएसएस संघ के मुख्यालय पर पहली बार 15 अगस्त 1947 को फहराया गया और इसके बाद 26 जनवरी 1950 को. इसके बाद आरएसएस के मुख्यालय पर तिरंगा सन् 2002 में नजर आया. तब इसे संघ के मुख्यालय और स्मृति भवन यानी संघ के संस्थापक हेडगेवार और गुरु गोलवलकर स्मृति-स्थल पर फहराया गया था.
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महात्मा गांधी की हत्या में तथाकथित भूमिका के मद्देनजर 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा. जब संघ के नेता प्रतिबंध हटाने की मांग लेकर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल से मिले तो सरदार पटेल ने उनके सामने कई शर्तें रखीं . इन शर्तों में एक यह भी था कि आरएसएस तिरंगे को अपना ध्वज स्वीकार करेगा.
पीएन चोपड़ा और प्रभा चोपड़ा के संपादन में प्रकाशित कलेक्टेड वर्क्स ऑफ सरदार पटेल(खंड- XIII) में सरदार पटेल का इस मसले पर अपना रुख दर्ज है. इस पुस्तक के मुताबिक 17 दिसंबर 1949 के दिन सरदार पटेल ने जयपुर में कांग्रेस की बैठक में कहा कि अगर कोई संगठन राष्ट्रध्वज की जगह कोई और झंडा अपनाता है तो उसके साथ सख्ती से निपटा जाएगा.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक 1930 और 1940 के दशक में आरएसएस का शायद ही कोई कार्यकर्ता राष्ट्रध्वज को सलामी देता नजर आता था. उनकी निष्ठा अपने संप्रदाय से जुड़ी थी ना कि पूरे राष्ट्र से. ये लोग अपने भगवा ध्वज को तिरंगे से कहीं ऊपर फहराते थे . महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद इस आशय की बहुत सी खबरें आईं कि आरएसएस के कार्यकर्ता तिरंगे को अपने पैरों से कुचल रहे हैं . इससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बड़े आहत हुए.
24 फरवरी 1948 के अपने भाषण में नेहरू ने अफसोस भरे स्वर में कहा, ‘ कुछ जगहों पर आरएसएस के कार्यकर्ता राष्ट्रीय झंडे का अपमान कर रहे हैं. वे अच्छी तरह जानते हैं कि राष्ट्रध्वज का अपमान करके वे अपने को गद्दार साबित कर रहे हैं. …’.
याद कीजिए ठीक एक साल पहले आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने तिरंगे के बारे में क्या कहा था. मोहन भागवत के शब्द थे- ‘बीआर आंबेडकर का भी ख्याल था कि भगवा(आरएसएस का झंडा) को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए. दुर्भाग्य कहिए कि हम उनके विचारों का प्रचार-प्रसार ना कर सके.’ आरएसएस के प्रमुख ने यह बात कानपुर की एक बैठक में कही थी।
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