अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनाने पर क्यों रोक लगाया था?

अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनाने पर क्यों रोक लगाया था?

15 अगस्त, 1947 को भारत में प्रशासन में👇

3% ब्राह्मण,
33% मुसलमान और
30% कायस्थ थे।

जैसे ही ब्राह्मण भारत का शासक बन गया; वैसे ही जो अंग्रेजों की दृष्टि से नालायक थे, वे भारत के नियंत्रणकर्ता होने के बाद सभी लायक हो गए और बाकी सारे नालायक हो गए। कोलकत्ता हाई कोर्ट में प्रीवी काउंसिल हुआ करती थी। अंग्रेजों ने नियम बनाया था कि कोई भी ब्राह्मण प्रीवी काउंसिल का चेयरमैन नहीं हो सकता है। क्यों नहीं हो सकता? इसके उत्तर में अंग्रेजों ने लिखा है कि ब्राह्मणों में जुडिशियस कैरेक्टर (न्यायिक चरित्र) नहीं होता है। यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि इसका क्या मतलब होता है? दरअसल, जुडिशियस कैरेक्टर का मतलब होता है कि जब दो वकील बहस कर रहे हों, तो जज पहले वकील की बहस ध्यानपूर्वक सुने, फिर दूसरे वकील की बहस ध्यानपूर्वक सुने। दोनों वकीलों के तर्क और बहस सुनने बाद वह निर्णय करता है कि सही क्या है? जिसके बाद वह न्यायपूर्वक फैसला देता है। इसे ही जुडिशियस कैरेक्टर कहते हैं। अब अंग्रेजों की उस बात पर कि ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता पर गौर करने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। यह बात उस समय की है जब जस्टिस ए.एस.आनंद सुप्रीम कोर्ट के चीफ हुआ करते थे, तब उनकी बेंच में तमिलनाडु का एक वकील बहस कर रहा था। जस्टिस ए.एस.आनंद उस वकील की बात सुन ही नहीं रहे थे, तो उस वकील ने जूता निकाला और जस्टिस ए.एस.आनंद को फेंककर मारा। जस्टिस ए.एस.आनंद ने तुरंत आदेश दिया, इसको गिरफ्तार करो। वकील को तत्काल गिरफ्तार करके उस कटघरे में खड़ा किया गया और पूछा गया कि तुमने जज साहब को जूता क्यों मारा? उस वकील ने जबाब दिया कि जज का ध्यान मेरी बहस की तरफ नहीं था। इसलिए उसका ध्यान अपनी बहस की तरफ केंद्रित करने के लिए मैंने जूता मारा। यानी अंग्रेज ब्राह्मणों के (न्यायिक चरित्र के) बारे में जो कहते थे कि ब्राह्मणों में जुडिशियस कैरेक्टर नहीं होता, वह गलत नहीं कहते थे। दरअसल, जुडिशियस कैरेक्टर का मतलब होता है- ”निष्पक्षता का भाव’’ अर्थात निष्पक्ष रहकर, दोनों पक्षों या दोनों पक्षों के बहस कर्ताओं (वकीलों आदि) को, गवाहों को सुनकर सबूतों तथा दस्तावेजों को ध्यानपूर्वक देखकर, कानून और न्याय के सिद्धांत के अनुसार अपनी मनमानी न करते हुए जो सही है, उसे न्याय दे। यह (गुण) ब्राह्मणों के अंदर नहीं है; -यह अंग्रेजों का कहना था।

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