विवेकानंद : जातिवाद-ब्राह्मणवाद से लड़ने वाले क्रांतिकारी जिन्हें भगवा हिंदूवादी बना दिया गया

Source: https://satyagrah.scroll.in/article/104284/swami-vivekananda-an-emotional-revolutionary-who-took-on-casteism-and-sacerdotalism

विवेकानंद : जातिवाद-ब्राह्मणवाद से लड़ने वाले क्रांतिकारी जिन्हें भगवा हिंदूवादी बना दिया गया

विवेकानंद के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा जातिवाद और पुरोहितवाद के खिलाफ ही है.

समाजवाद ने भी उन्हें सहज ही आकर्षित किया था. नवंबर, 1894 में न्यूयॉर्क से अलासिंगा पेरुमल को वे चिट्ठी में लिखते हैं-

‘अन्न! अन्न! मुझे इस बात का विश्वास नहीं है कि वह भगवान जो मुझे यहां पर अन्न नहीं दे सकता, वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा . राम कहो! भारत को उठाना होगा, गरीबों को खिलाना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा और पौरोहित्य की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वे चकराती हुई एकदम अटलांटिक महासागर में जाकर गिरें.’

जापान से अपने मद्रासी मित्रों को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं – ‘ आओ मनुष्य बनो. उन पाखंडी पुरोहितों को जो सदैव उन्नति में बाधक होते हैं, बाहर निकाल दो , क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा. उनके हृदय कभी विशाल न होंगे. उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अंधविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है. पहले इनको जड़मूल से निकाल फेंको.’

जाति से ब्राह्मण नहीं होने की वजह से स्वयं विवेकानंद को भयंकर भेदभाव का शिकार होना पड़ा. इतना कि कलकत्ते में उनके लिए सार्वजनिक सभा तक करना मुश्किल हो गया और कुछ समय के लिए उन्होंने प्रण किया कि वे केवल व्यक्तिगत प्रवचन ही करेंगे.

एक स्थान पर वे कहते हैं- ‘स्मृति और पुराण सीमित बुद्धिवाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेदभाव और द्वेषभाव से परिपूर्ण हैं. …राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे. …पुरोहितों की लिखी हुई पुस्तकों में ही जाति जैसे पागल विचार पाए जाते हैं.’ लेकिन बाद में चालाकी से कुछ लोगों ने उनकी एक ऐसी छवि गढ़ी जिससे वे भी भगवा-वस्त्रधारी हिंदूवादी साबित हो जाएं. यही कारण है कि न तो प्रगतिशीलों ने उन्हें अपनाया, न समाजवादियों ने और न ही जाति-विरोधी आंदोलनों ने. उनको हड़पा भी तो किसने – राजनीतिक हिंदूवादियों ने. असली विवेकानंद को जानने पर यह एक बहुत बड़ा विरोधाभास नजर आता है.

विवेकानंद किसी भी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ थे. जीवन-चर्या को लेकर भी वे किसी कठोर अनुशासन के पक्षधर नहीं थे. उन्हें स्वयं भी मांसाहार और धूम्रपान से परहेज नहीं था. हालांकि उन्होंने इन सब चीजों का कभी महिमांडन भी नहीं किया. जातिभेद के प्रसंग में उन्होंने अपने धूम्रपान से जुड़ी एक घटना का जिक्र अवश्य किया.

यदि भारत के भविष्य निर्माण करना हो तो ब्राह्मणों को पैरों तले कुचल डालो ! – स्वामी विवेकानंद 👇👇👇

स्वामी विवेकानन्द शिकागो में जब “विश्व धर्म” सम्मेलन का आयोजन 1893 में हो रहा था तब स्वामी विवेकानन्द धर्म सम्मेलन मे बोलने हेतु पहुंचे थे, उन्होने आयोजकों से विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण देने की इजाजत मांगी, तो आयोजकों ने उनसे हिन्दू धर्म के प्रवक्ता होने का प्रमाण पत्र मांगा, तो स्वामी विवेकानन्द ने वहां शिकागो से भारत के शंकराचार्य को तार भेजा और कहा की मुझे हिन्दू धर्म का प्रवक्ता होने का प्रमाण पत्र भिजवाने का कष्ट करें। इस पर शंकराचार्य (जो की ब्राम्हण जाति की आरक्षित उपाधि है) ने स्वामी विवेकानन्द को कहा की, ” तुम ब्राम्हण जाति के नहीं हो बल्कि “शूद्र” जाति के हो; अत: तुम्हें हिन्दूओ का प्रवक्ता नहीं बनाया जा सकता है।

शंकराचार्य के जातिवाद और भेदभाव से स्वामीजी का मन उदास हो गया , वे ब्राम्हणों के इस व्यवहार से काफी दुखी हुए । स्वामीजी की पीड़ा देख कर वहां शिकागो में मौजूद श्रीलंका से आए “बौद्ध धर्म” के प्रवक्ता अनागरिक धम्मपाल बौद्ध जी ने स्वामीजी को अपनी ओर से एक सहमति पत्र दिया कि स्वामी विवेकानन्द विद्वान है, एवं ओजस्वी वक्ता है। इन्हें धर्म ससंद मॆं अपनी बातें कहने का मौका दिया जाये। इस तरह स्वामी जी को हिन्दू धर्म पर बोलने का मौका दिया।

शास्त्रों में उल्लेख होने के कारण स्वामीजी को शिकागो की धर्म ससंद मॆं बोलने के लिये ब्राह्मणों ने अधिकृत नहीं किया। विवेकानंद को बोलने के लिए धम्मपाल के भाषण के समय में से सिर्फ पांच मिनट दिये गये। उस पाच मिनट में स्वामिजी ने अपनी बात रखी और इन्ही पांच मिनट की वजह से उनको सर्वोत्तम वक्ता का इनाम मिला ।ब्राह्मणों के दुर्व्यवहार के कारण ही स्वामी जी ने अपनी पुस्तक” भारत का भविष्य ” में कहा है कि, यदि भारत के भविष्य निर्माण करना हो तो ब्राम्हणों को पैरों तले कुचल डालो !

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