विवेकानंद : जातिवाद-ब्राह्मणवाद से लड़ने वाले क्रांतिकारी जिन्हें भगवा हिंदूवादी बना दिया गया

Source: https://satyagrah.scroll.in/article/104284/swami-vivekananda-an-emotional-revolutionary-who-took-on-casteism-and-sacerdotalism

विवेकानंद : जातिवाद-ब्राह्मणवाद से लड़ने वाले क्रांतिकारी जिन्हें भगवा हिंदूवादी बना दिया गया

विवेकानंद के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा जातिवाद और पुरोहितवाद के खिलाफ ही है.

समाजवाद ने भी उन्हें सहज ही आकर्षित किया था. नवंबर, 1894 में न्यूयॉर्क से अलासिंगा पेरुमल को वे चिट्ठी में लिखते हैं-

‘अन्न! अन्न! मुझे इस बात का विश्वास नहीं है कि वह भगवान जो मुझे यहां पर अन्न नहीं दे सकता, वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा . राम कहो! भारत को उठाना होगा, गरीबों को खिलाना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा और पौरोहित्य की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वे चकराती हुई एकदम अटलांटिक महासागर में जाकर गिरें.’

जापान से अपने मद्रासी मित्रों को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं – ‘ आओ मनुष्य बनो. उन पाखंडी पुरोहितों को जो सदैव उन्नति में बाधक होते हैं, बाहर निकाल दो , क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा. उनके हृदय कभी विशाल न होंगे. उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अंधविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है. पहले इनको जड़मूल से निकाल फेंको.’

जाति से ब्राह्मण नहीं होने की वजह से स्वयं विवेकानंद को भयंकर भेदभाव का शिकार होना पड़ा. इतना कि कलकत्ते में उनके लिए सार्वजनिक सभा तक करना मुश्किल हो गया और कुछ समय के लिए उन्होंने प्रण किया कि वे केवल व्यक्तिगत प्रवचन ही करेंगे.

एक स्थान पर वे कहते हैं- ‘स्मृति और पुराण सीमित बुद्धिवाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेदभाव और द्वेषभाव से परिपूर्ण हैं. …राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे. …पुरोहितों की लिखी हुई पुस्तकों में ही जाति जैसे पागल विचार पाए जाते हैं.’ लेकिन बाद में चालाकी से कुछ लोगों ने उनकी एक ऐसी छवि गढ़ी जिससे वे भी भगवा-वस्त्रधारी हिंदूवादी साबित हो जाएं. यही कारण है कि न तो प्रगतिशीलों ने उन्हें अपनाया, न समाजवादियों ने और न ही जाति-विरोधी आंदोलनों ने. उनको हड़पा भी तो किसने – राजनीतिक हिंदूवादियों ने. असली विवेकानंद को जानने पर यह एक बहुत बड़ा विरोधाभास नजर आता है.

विवेकानंद किसी भी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ थे. जीवन-चर्या को लेकर भी वे किसी कठोर अनुशासन के पक्षधर नहीं थे. उन्हें स्वयं भी मांसाहार और धूम्रपान से परहेज नहीं था. हालांकि उन्होंने इन सब चीजों का कभी महिमांडन भी नहीं किया. जातिभेद के प्रसंग में उन्होंने अपने धूम्रपान से जुड़ी एक घटना का जिक्र अवश्य किया.

यदि भारत के भविष्य निर्माण करना हो तो ब्राह्मणों को पैरों तले कुचल डालो ! – स्वामी विवेकानंद 👇👇👇

स्वामी विवेकानन्द शिकागो में जब “विश्व धर्म” सम्मेलन का आयोजन 1893 में हो रहा था तब स्वामी विवेकानन्द धर्म सम्मेलन मे बोलने हेतु पहुंचे थे, उन्होने आयोजकों से विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण देने की इजाजत मांगी, तो आयोजकों ने उनसे हिन्दू धर्म के प्रवक्ता होने का प्रमाण पत्र मांगा, तो स्वामी विवेकानन्द ने वहां शिकागो से भारत के शंकराचार्य को तार भेजा और कहा की मुझे हिन्दू धर्म का प्रवक्ता होने का प्रमाण पत्र भिजवाने का कष्ट करें। इस पर शंकराचार्य (जो की ब्राम्हण जाति की आरक्षित उपाधि है) ने स्वामी विवेकानन्द को कहा की, ” तुम ब्राम्हण जाति के नहीं हो बल्कि “शूद्र” जाति के हो; अत: तुम्हें हिन्दूओ का प्रवक्ता नहीं बनाया जा सकता है।

शंकराचार्य के जातिवाद और भेदभाव से स्वामीजी का मन उदास हो गया , वे ब्राम्हणों के इस व्यवहार से काफी दुखी हुए । स्वामीजी की पीड़ा देख कर वहां शिकागो में मौजूद श्रीलंका से आए “बौद्ध धर्म” के प्रवक्ता अनागरिक धम्मपाल बौद्ध जी ने स्वामीजी को अपनी ओर से एक सहमति पत्र दिया कि स्वामी विवेकानन्द विद्वान है, एवं ओजस्वी वक्ता है। इन्हें धर्म ससंद मॆं अपनी बातें कहने का मौका दिया जाये। इस तरह स्वामी जी को हिन्दू धर्म पर बोलने का मौका दिया।

शास्त्रों में उल्लेख होने के कारण स्वामीजी को शिकागो की धर्म ससंद मॆं बोलने के लिये ब्राह्मणों ने अधिकृत नहीं किया। विवेकानंद को बोलने के लिए धम्मपाल के भाषण के समय में से सिर्फ पांच मिनट दिये गये। उस पाच मिनट में स्वामिजी ने अपनी बात रखी और इन्ही पांच मिनट की वजह से उनको सर्वोत्तम वक्ता का इनाम मिला ।ब्राह्मणों के दुर्व्यवहार के कारण ही स्वामी जी ने अपनी पुस्तक” भारत का भविष्य ” में कहा है कि, यदि भारत के भविष्य निर्माण करना हो तो ब्राम्हणों को पैरों तले कुचल डालो !

कहा लिखा हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी है..? ⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇ 1. ऋग्वेद में श्लोक 10 में लिखा है कि हम (वैदिक ब्राह्मण ) उत्तर ध्रुव से आये हुए लोग है। जब आर्य व् अनार्यो का युद्ध हुआ । 2. The Arctic Home At The Vedas बालगंगाधर तिलक (ब्राह्मण) के द्वारा लिखी पुस्तक में मानते है की हम बाहर आए हुए लोग है । 3. जवाहर लाल नेहरु ने (बाबर के वंशज फिर कश्मीरी पंडित बने) उनकी किताब Discovery of India में लिखाहै कि हम मध्य एशिया से आये हुए लोग है। यह बात कभी भूलना नही चाहिए, ऐसे 30 पत्र इंदिरा जी को लिखे जब वो होस्टल में पढ़ रही थी। 4. वोल्गा टू गंगा में “राहुल सांस्कृतयान” (केदारनाथ के पाण्डेय ब्राहम्ण) ने लिखा है कि हम बाहर से आये हुए लोग है और यह भी बताया की वोल्गा से गंगा तट (भारत) कैसे आए। 5. विनायक सावरकर ने (ब्राम्हण) सहा सोनरी पाने “इस मराठी किताब में लिखा की हम भारत के बाहर से आये लोग है। 6. इक़बाल “काश्मीरी पंडित ” ने भी जिसने “सारे जहा से अच्छा” गीत लिखा था की हम बाहर से आए हुए लोग है। 7. राजा राम मोहन राय ने इग्लेंड में जाकर अपने भाषणों में बोला था कि आज मै मेरी पितृ भूमि यानि अपने घर वापस आया हूँ। 8. मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने 1894 में दक्षिणी अफ्रीका के विधान सभा में लिखे एक पत्र के अनुसार हम भारतीय होने के साथ साथ युरोशियन है हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है। 9. मनुस्मृति श्लोक नं.२४ 10. लाला लजतपराय द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ २१-२२ 11. पंडित श्यामबिहारी मिश्रा और सुखदेव बिहारी मिश्रा द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास,भाग १ पृष्ठ ६२ ओर ६३ 12. पं.जनार्दन भट्ट एम.ए द्वारा लिखित -माधुरी मासिक – भारतीय पुरातत्व की नयी खोज १९२५ – पृष्ठ २७ ओर २९ 13. हिँदी भाषा की उत्पति – आचार्य महावीर द्विवेदी 14. हिँदुत्व – पं.लक्ष्मीनारायण गर्दे, पृष्ठ – ८,९ ओर २९ 15. आर्योँ का आदिम निवास -पं.जगन्नाथ पांचोली. 16. २९ वा अखिल भारतीय हिंदू महासमेलन रामानंद चॅटर्जी, मॉडर्न रिव्ह्यू का भाषण 16. काका कालेलकर रिपोर्ट 17. धर्मशास्राचा इतिहास – पा.वा.काणे करना 18. हिंदू सभ्यता – राधाकृष्ण मुखर्जी, पृष्ठ ४१,४७ ओर ५९ 19. वोल्गा से गंगा – राहुल सांस्कृत्यायन 20. ना.गो.चाफेकर चित्पावन – पृष्ठ २९५ 21. ग्रीक ओरिजन्स ऑफ कोकणस्थ चित्पावन -प्रताप जोशी 22. स्वामी दयानंद सरस्वती -सत्यप्काश ग्रंथ 23. टाईम्स ऑफ इंडिया का 2001 का DNA रिपोर्ट डॉ. बाबासाहेब अबेडकरने शुद्र कौन थे इस पुस्तक मे आर्य विदेशी हे, की नहीं इसपर संशोधन होना बाकि हे, ऐसे लिखा था. और दूसरी जगह उन्होंने उसी पुस्तक मे आर्य विदेशी हे, ये कहा था, बाबासाहेब ने लोकमान्य टिळक का उदहारण देकर बताया था की, अगर आर्य उत्तर ध्रुव से आये हे, और उनका वाहन उस टाइम घोडा था.।परंतु बाबासाहेब ने उनके आखरी पुस्तक बुद्ध धम्म में सारनाथ के भाषण मे, आर्य ये विदेशी हे बताया था. आर्य भारत में आने से पाहिले नाग लोगोंकी संस्कृति थी याने नागवंशी लोगोंकी,यहा की संस्कृति नष्ट करने का काम आर्यो जे किया. आर्योंने घोड़े पे बैठ कर लढाई की तो यहा नागवंशी लोगों ने जमीन से लढाई की. Dr.B.R.Ambedkar Writing and Speeches Vol.17 part 3 pg.no.431 . . . ब्रह्म समाज के नेता सुब चन्द्र सेन ने 1877 में कलकत्ता कीएक सभा में कहा था कि अंग्रेजो के आने से हम सदियों से बिछड़े चचेरे भाइयों का (आर्य ब्रह्मण और अंग्रेज ) पुनर्मिलन हुआ है। . . इस सन्दर्भ में अमेरिका के Salt lake City स्थित युताहा विश्वविधालय (University of Utaha’ USA) के मानव वंश विभाग के वैज्ञानिक माइकल बमशाद और आंध्र प्रदेश के विश्व विद्यापीठ विशाखा पट्टनम के Anthropology विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा सयुक्त तरीको से 1995 से 2001 तक लगातार 6 साल तक भारत के विविध जाति-धर्मो और विदेशी देश के लोगो के खून पर किये गये DNA के परिक्षण से एक रिपोर्ट तैयार की। ” जिसमें बता गया कि भारत देश की ब्राह्मण जाति के मध्य यूरेशिया के पास जो “काला सागर ’Black Sea” है वहां के लोगो से मिलता है” । . . . इस रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकालता है कि ब्राह्मण विदेशी लोग है और एस सी, एस टी और ओबीसी में बंटे लोग (कुल 6743 जातियां) और भारत के धर्म परिवर्तित मुसलमान, सिख, बुध, ईसाई आदि धर्मों के लोगों का DNA आपस में मिलता है। जिससे साबित होता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोग भारत के मूलनिवासी है, इससे यह भी पता चलता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्मपरिवर्तित लोग एक ही वंश के लोग है, एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोगों को आपस में जाती के आधार पर बाँट कर ब्राह्मणों ने सभी भारतीय लोगोंपर झूटी धार्मिक गुलामी थोप रखी है। . . 1900 के शुरुआतसे आर्य समाज ब्राह्मण जैसे संगठन बनाने वाले इन लोगो ने 1925 से हिन्दु नामक चोला पहनाकर घुमाते आ रहे है, उक्त ब

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LORD Buddha – तिरुपति बालाजी मंदिर पहले बौद्ध विहार था…। सिर मुंडनकरने की प्रथा किसी भी हिन्दू मंदिर में नही है, ये प्रथा सिर्फ बौद्ध धम्म की है। बालाजी मंदिर में पहले जो भी भिक्खु बनने आता था उसका सर मुंडन किया जाता था। मुंडन की ये प्रथा आज भी चली आ रही है।तिरुपति बालाजी की जो मूर्ति है वो बुद्ध की ही है। समय के साथ ब्राह्मणों ने कब्जा करके बुद्ध को बालाजी बना दिया और अपना व्यसाय शुरू कर दिया।उसी तरह पंडरपुर का मंदिर भी बौद्ध विहार था उसे भी ब्राह्मणों ने व्यसाय करने के लिए बुद्ध की मूर्ति को विट्ठल बना दिया। यदि मूर्ति का सभी कपडा हटा कर देखेंगे तो सच्चाई सामने आ जायेगी, तथा वहाँ के दिवालो में पाली भाषा में लिखा हुआ लेख भी बौद्ध विहार होने का पुष्टि करता है…उसी तरह जगननाथ पूरी का मंदिर भी बौद्ध विहार था,,,अब इसके आगे एक ही शब्द है की पहले पूरा भारत बौद्धमय था,,,धीरे धीरे लोग समझदार होंगे और कर्मकांडो से दूर होंगे तथा भारत फिर से बौद्धमय होगा,,, जय भिम (बाबासाहेब आंबेडकर writing and speeches, volume 18. Part 3 page no 424)

ब्राह्मणवाद का पोस्टमार्टम ” ब्राह्मण के गुण – तीन मान हरे, धन सम्पत्ति लूटे और मति लियो छीन , ये ब्राह्मण के गुण तीन ” आप जानते हैं कि एक तरफ तो हिन्दुओं के ईश्वर श्रीकृष्ण जी ने गीता में उपदेश देकर कहा कि आत्मा अजर अमर हैं , आत्मा को न कोई काट सकता है और न कोई मार सकता है , न पानी उसे गला सकता है , न आग उसे जला सकती है , आत्मा को कोई नष्ट नहीँ कर सकता वगैरा वगैरा दूसरी तरफ ब्राह्मणों के चहेते ईश्वर विष्णु जी द्वारा प्रभावित गरुड़ पुराण में सभी प्राणियों के कर्म के अनुसार दण्ड का प्रावधान है मुझ नासमझ को समझाओ भाई मेरी समझ में ये नहीँ आता कि जब कौई भी प्राणी मरता है तो उसका शरीर तो यहीं नष्ट हो जाता है केवल उसकी आत्मा ही बचती हैं और आत्मा को कौई न मार सकता न काट सकता तो फिर गरुड़ पुराण के अनुसार दण्ड कौन भोगता है भाई ये सोचकर मेरे दिमाग का दही बन गया ? बताओ भाई मैं ही मूर्ख हूँ या ब्राह्मणवाद ! दिमाग की बत्ती जलाओ , अज्ञानता मिटाओ – ब्राह्मणवाद भगाओ

जनेऊ के प्रकार – जनेऊ के कुछ प्रकारों को बताते हैं – (1)ब्राह्मण जनेऊ में सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं। ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। (2)6 सूत्रों वाला जनेऊ क्षत्रिये के लिये, इसमें गोत्र के जितने प्रवर होंगे उतने ग्रन्थियां लगेंगी। (3)9 सूत्रों वाला जनेऊ यह वैश्य वर्ग के द्विजों केलिये होता है। (4) कुछ ब्राह्मणों में ऐसी भी मान्यता है कि ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं। इस प्रकार से भिन्न भिन्न वेद शाखाओं में भिन्न भिन्न तरह के परम्पराओं का जनेऊ के सम्बन्ध में मान्यताएं हैं। अर्थात परम्परा भेद होता है। जिसकी जो परपरा होती है वो उसी के अनुसार जनेऊ धारण करता है।यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। अर्थात कमर से नीचे जहां तक सिद्धे में हमारी हथेली जाए।उपनयन संस्कार (जनेऊ धारण करना) का अधिकार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को दिया गया था। शूद्रों को उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है। ब्राह्मण सूत का जनेऊ क्षत्रिय सन का जनेऊ और वैश्य उन का जनेऊ पहनते हैं। ब्राह्मण केलिये जनेऊ वसन्त ,क्षत्रिय केलिये ग्रीष्म और वैश्य केलिये शरद ऋतु रखा गया है। इस प्रकार और बाटे भी हैं लेकिन अगर समुचित रूप से कहें तो जनेऊ के तीन प्रकार होते हैं जो ब्राह्मण जनेऊ वैश्य जनेऊ और क्षत्रिय जनेऊ के रूप में है।

मंदिर में भगवान नही ब्राह्मणों का पेट है।

बुद्धा ने बताया
लोगों ने नही सुना।
कबीर ने बताया
लोगों ने नही सुना।
जोतिबा फ़ूले ने बताया
लोगों ने नही सुना।
गाडगे बाबा ने बताया
लोगों ने नही सुना।
संत तुकाराम ने बताया
लोगों ने नही सुना।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने बताया
लोगों ने नही सुना।
अब कोरोना ने बता दिया कि मंदिर में भगवान नही
ब्राह्मणों का पेट है।
अभी नही सुधरे तो कभी नही सुधरोगे।
जनहित में प्रसारित🙏🏻

3% विदेशी ब्राह्मणों से सवाल



सवाल नं 1- क्या जातिप्रथा और वर्णप्रथा में पिछड़ी जातियों को मुसलमानों ने बाटा या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने?

सवाल नं 2- क्या धर्म के नाम पर 33 करोड़ काल्पनिक देवी-देवताओं का निर्माण कर पत्थरो की मूर्तियों के नाम पर मुसलमान हमको ठग रहे है या 3% विदेशी ब्राह्मण ?

सवाल नं 3- क्या हमारे संविधान में मिले ”रिजर्वेशन” का विरोध मुसलमान कर रहे है या 3% विदेशी ब्राह्मण ?

सवाल नं 4- क्या हमारे महापुरुषों रविदास, कबीर, तुकाराम, फुले, शाहूजी महाराज, बाबा साहब अम्बेडकर, कांशीराम, पेरियार इत्यादि को षड्यंत्र से मारने का सफल या असफल प्रयास मुसलमानों ने किया या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 5- हमारी महान हरप्पा मोहनजोदाड़ो की सिंध सभ्यता पर हमला मुसलमानों ने किया या 3% विदेशी आर्य ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 6- मंडल कमीशन को दबाने के लिए रथ यात्रा मुसलमानों ने निकाली या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 7- क्या सदियों से SC, ST, OBC के लोगो के साथ छुआछूत का दुर्व्यवहार मुसलमानों ने किया या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवान नं 8- आज भारत पर न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया, विधायिका पर मुसलमानों का कब्जा है या 3% विदेशी ब्राह्मणों का ?

सवान नं 9- क्या निजीकरण, भूमंडलीकरण के नाम पर देश को उद्योगपतियों के हाथो मुसलमान बेच रहे है या 3% विदेशी ब्राह्मण ?

सवाल नं 10- क्या शुद्र कह कर शिवाजी महाराज (कुर्मी) का राज्याभिषेक मुसलमानों ने नकारा या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 11- क्या शिवाजी महाराज का राज्यतिलक बाए पैर के अंगूठे से कर उस महाप्रतापी राजा का अपमान मुसलमानों ने किया या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 12- सम्राट अशोक के पुत्र की हत्या मुसलमानों ने की या 3% विदेशी ब्राह्मणों ने ?

सवाल नं 13- हर गाँव हर घर में पिछड़ी जातियों को आपस में लड़ाने का काम मुसलमान करते है या 3% विदेशी ब्राह्मण ?

सवाल नं 15- बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत, जैसे स्वतंत्र धर्मो को ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) की शाखा कहकर प्रचारित कर उनका स्वतंत्र अस्तित्व मुसलमान ख़त्म कर रहे है कि ब्राह्मण ?
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सवाल तो हजारो है पर आज बस इतना ही। मुसलमानों ने हमारे लिए क्या किया इसकी भी जानकारी आपको देता हूँ।

भारतीय इतिहास की कुछ शानदार घटनाये :—

(1) राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले को अपना स्कूल बनाने के लिये जमीन उस्मान शेख नाम के एक मुसलमान ने दी थी।

(2) उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख ने सावित्री बाई फूले का साथ देकर उनके स्कूल में पढा़ने का काम किया था।

(3) बाबा साहेब अम्बेडकर ने जब चावदार तालाब का आंदोलन चलाया और सभा करने के लिये बाबा साहेब को कोई हिन्दु जगह नहीं दे रहा था। तब उस समय मुसलमान भाइयों ने आगे आकर अपनी जगह दी थी और बाबा साहेब से कहा था कि “आप हमारी जगह मे अपनी सभा कर सकते हो”

(4) गोलमेज परिषद मे जब गांधी जी ने बाबा साहेब का विरोध किया था और रात के 12 बजे गांधी जी ने मुसलमानों को बुलाकर कहा था कि आप बाबा साहेब का विरोध करो तो मैं आपकी सभी मांगे मांग लूंगा। तब मुसलमान भाई आगार खांन साहब ने गांधी जी को मना कर दिया था और कहा था कि हम बाबा साहेब का विरोध किसी भी हाल मे नहीं करेंगे।

(5) मौलाना हसरत मोहानी ने बाबा साहब को रमजा़न के पवित्र माह में अपने घर रोजा़ इफ्तार की दावत दी थी। जबकि पंडित मदनमोहन मालवीय ने तो बाबा साहब को एक गिलास पानी तक नहीं दिया था।

(6) जब सारे हिन्दुओं (गांधी और नेहरू) ने मिलकर बाबा साहेब के लिये संविधान सभा के सारे दरवाजे और खिड़किया भी बंध कर दी थीं। तब पश्छिम बंगाल के मुसलमानों व चांडालों ने बाबासाहेब को वोट देकर चुनाव जिताकर संविधान सभा मे भेजा था।

इसीलिए SC, ST और OBC समाज के लोगों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि मुस्लिम नेताओं ने बाबा साहेब अम्बेडकर का अक्सर साथ दिया था। जबकि गांधी और तिलक हमेशा ही बाबा साहेब आंबेडकर के रास्ते में मुश्किलें पैदा करते रहे थे।

अभी भी SC, ST और OBC के आरक्षण के खिलाफ संघी ही आंदोलन चलाते हैं, मुस्लिम नही।

*जागोबहुजनो जागो

अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनाने पर क्यों रोक लगाया था?

अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनाने पर क्यों रोक लगाया था?

15 अगस्त, 1947 को भारत में प्रशासन में👇

3% ब्राह्मण,
33% मुसलमान और
30% कायस्थ थे।

जैसे ही ब्राह्मण भारत का शासक बन गया; वैसे ही जो अंग्रेजों की दृष्टि से नालायक थे, वे भारत के नियंत्रणकर्ता होने के बाद सभी लायक हो गए और बाकी सारे नालायक हो गए। कोलकत्ता हाई कोर्ट में प्रीवी काउंसिल हुआ करती थी। अंग्रेजों ने नियम बनाया था कि कोई भी ब्राह्मण प्रीवी काउंसिल का चेयरमैन नहीं हो सकता है। क्यों नहीं हो सकता? इसके उत्तर में अंग्रेजों ने लिखा है कि ब्राह्मणों में जुडिशियस कैरेक्टर (न्यायिक चरित्र) नहीं होता है। यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि इसका क्या मतलब होता है? दरअसल, जुडिशियस कैरेक्टर का मतलब होता है कि जब दो वकील बहस कर रहे हों, तो जज पहले वकील की बहस ध्यानपूर्वक सुने, फिर दूसरे वकील की बहस ध्यानपूर्वक सुने। दोनों वकीलों के तर्क और बहस सुनने बाद वह निर्णय करता है कि सही क्या है? जिसके बाद वह न्यायपूर्वक फैसला देता है। इसे ही जुडिशियस कैरेक्टर कहते हैं। अब अंग्रेजों की उस बात पर कि ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता पर गौर करने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। यह बात उस समय की है जब जस्टिस ए.एस.आनंद सुप्रीम कोर्ट के चीफ हुआ करते थे, तब उनकी बेंच में तमिलनाडु का एक वकील बहस कर रहा था। जस्टिस ए.एस.आनंद उस वकील की बात सुन ही नहीं रहे थे, तो उस वकील ने जूता निकाला और जस्टिस ए.एस.आनंद को फेंककर मारा। जस्टिस ए.एस.आनंद ने तुरंत आदेश दिया, इसको गिरफ्तार करो। वकील को तत्काल गिरफ्तार करके उस कटघरे में खड़ा किया गया और पूछा गया कि तुमने जज साहब को जूता क्यों मारा? उस वकील ने जबाब दिया कि जज का ध्यान मेरी बहस की तरफ नहीं था। इसलिए उसका ध्यान अपनी बहस की तरफ केंद्रित करने के लिए मैंने जूता मारा। यानी अंग्रेज ब्राह्मणों के (न्यायिक चरित्र के) बारे में जो कहते थे कि ब्राह्मणों में जुडिशियस कैरेक्टर नहीं होता, वह गलत नहीं कहते थे। दरअसल, जुडिशियस कैरेक्टर का मतलब होता है- ”निष्पक्षता का भाव’’ अर्थात निष्पक्ष रहकर, दोनों पक्षों या दोनों पक्षों के बहस कर्ताओं (वकीलों आदि) को, गवाहों को सुनकर सबूतों तथा दस्तावेजों को ध्यानपूर्वक देखकर, कानून और न्याय के सिद्धांत के अनुसार अपनी मनमानी न करते हुए जो सही है, उसे न्याय दे। यह (गुण) ब्राह्मणों के अंदर नहीं है; -यह अंग्रेजों का कहना था।

रामायण का सच

विदेशी आर्य ब्रह्मणो ने क्या लिख रखा है रामायण में हम मूलनिवासियो के बारे में👇

खुद से पढना लिखना सीखो बिना ब्रह्मणो के :-

🚩 रामचरितमानस 🚩

1️⃣ जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।
पनारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥3॥

भावार्थ:-तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि वर्ण में नीच हैं।
स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥3॥

2️⃣ बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि॥99 ख॥

भावार्थ:- शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। (ऐसा कहकर) वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥99 (ख)॥

4️⃣ ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥4॥

भावार्थ:-वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥4॥

5️⃣ सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥5॥

भावार्थ :-शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥5॥

6️⃣ ते बिप्रन्ह सन आप पुजावही,उभय लोक निज हाथ नसावही।

भावार्थ :- जो लोग ब्रह्मण से सेवा/ काम लेते हैं, वे अपने ही हाथों स्वर्ग लोक का नाश करते हैं

7️⃣ अधम जाति मै विद्या पाएँ। भयऊँ जथा अहि दूध पिआएँ
(उ०का० 105 क 03)

भावार्थ :- नीच जाति (SC,ST,OBCs) विद्या/ज्ञान प्राप्त करके वैसे ही जहरीले हो जाते हैं जैसे दूध पिलाने के बाद साँप।

8️⃣ आभीर(अहिर) जमन किरात खस,स्वपचादि अति अधरूप जे!!
(उ• का• 129 छं•01 ) भावार्थ :-यादव, मुसलमान, कोल,किरात, खस, श्वपचादि बहुत ही पापी होते हैं|
जाति बता दिया,जो एक षडयंत्र के सिवा कुछ नहीं है|

9️⃣ काने खोरे कूबरे कुटिल कुचली जानि।।
(अ• का• दोहा 14)

भावार्थ :-दिव्यांग abnormal का घोर अपमान, जिन्हें भारतीय संविधान ने उन्हें तो एक विशेष इंसान का दर्जा दिया & विशेष हक-अधिकार भी दिये)

1️⃣0️⃣ सति हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्वग्य,कीन्ह कपटु मै संभु सन नारी सहज अग्य
(बा • का• दोहा 57क)

भावार्थ 😦 नारी स्वभाव से ही अज्ञानी)बाकि अथॅ खुद समझे ।

1️⃣1️⃣ ढोल गवार शूद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी ।।

भावार्थ :-ढोल, गंवार और पशुओं की हीे तरह # शूद्र (SC,ST,OBCs) एव साथ-साथ # नारी को भी पीटना चाहिए)
( सु•का• दोहा 58/ 03)

1️⃣2️⃣ पुजिए बिप्र शील गुण हीना,शूद्र न पुजिए गुण ज्ञान प्रविना*

भावार्थ:- ब्रह्मण चाहे शील-गुण वाला नहीं है फिर भी पूजनीय हैं और शूद्र (SC,ST,OBCs)चाहे कितना भी शीलवान,गुणवान या ज्ञानवान हो मान-सम्मान नहीं देना चाहिए)

इस प्रकार से अनेको जगह जाति एवं वर्ण के नाम रखकर अपशब्द बोला गया है। पुरे रामचरितमानस व रामायण मे जाति के नाम से गाली दिया गया है।
इसी रामायण मे बालकाण्ड के दोहा 62 के श्लोक 04 मे कहा गया है, कि जाति अपमान सबसे बड़ा अपमान है।

इतना अपशब्द लिखने के बाद भी हमारा शूद्र/अछुत समाज (SC, ST, OBCs) रामायण को सीने से लगा कर रखे हुए है, और हजारो , लाखो रूपये खर्च कर रामधुन (अष्टयाम ) कराते है। कर्ज मे डूबे रहते है। बच्चे को सही शिक्षा नही देते है और कहते है कि भगवान के मर्जी है ।

शिक्षित बने जागरूक बने
कुछ (SC,ST,OBCs) लोग पढ़ने-लिखने के पश्चात (डाॅ भीमराव अंबेडकर जी) के लिखे गए संविधान के आधार पर नौकरी पाते है और कहते है कि ये सब राम जी के कृपा से हुआ है।।

जागो शिक्षा ही सवोॅपरि है ।
यदि आप (भगवान राम ) के कृपा से ही पढे लिखे और नौकरी पाए तो आपके पिताजी, दादाजी, परदादाजी & दादी, नानी, परदादी, इत्यादि भी पढे लिखे होते नौकरी पेशा मे होते!

यदि सब राम (भगवान )के कृपा से ही हुआ है, तो आप बताइए कि अंग्रेज़ के राज के पहले एक भी शूद्र (SC,ST,OBCs) पढ़ा लिखा विद्वान बना हो?

उस जमाने मे डाक्टर भीमराव अम्बेडकर जी पढे थे जिन्होने जरूरत मंद को अधिकार दिलवा गये ।।।

मेरे प्यारों!!
आप शूद्र/अछूत अर्थात मूलनिवासी (SC,ST,OBCs) जो भी कुछ है, भारतीय संविधान के बल पर ही है।

इसलिए हम सब का परम कर्तव्य बनता है कि भारतीय संविधान की रक्षा करें।
संविधान सवोॅपरि है l

जय भारत

रामचरितमानस

आरएसएस का भगवा ध्वज और राष्ट्र ध्वज तिरंगा

आरएसएस का भगवा ध्वज और राष्ट्रध्वज

🚩RSS Flag and Indian Flag🇮🇳

शायद यह जानकर बड़ा आपको धक्का लगेगा कि कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों या फिर वामियों ने नहीं बल्कि आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर पूरे 52 साल राष्ट्रध्वज नहीं फहराया .

राष्ट्रध्वज आरएसएस संघ के मुख्यालय पर पहली बार 15 अगस्त 1947 को फहराया गया और इसके बाद 26 जनवरी 1950 को. इसके बाद आरएसएस के मुख्यालय पर तिरंगा सन् 2002 में नजर आया. तब इसे संघ के मुख्यालय और स्मृति भवन यानी संघ के संस्थापक हेडगेवार और गुरु गोलवलकर स्मृति-स्थल पर फहराया गया था.

🚩🚩🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

महात्मा गांधी की हत्या में तथाकथित भूमिका के मद्देनजर 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा. जब संघ के नेता प्रतिबंध हटाने की मांग लेकर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल से मिले तो सरदार पटेल ने उनके सामने कई शर्तें रखीं . इन शर्तों में एक यह भी था कि आरएसएस तिरंगे को अपना ध्वज स्वीकार करेगा.

पीएन चोपड़ा और प्रभा चोपड़ा के संपादन में प्रकाशित कलेक्टेड वर्क्स ऑफ सरदार पटेल(खंड- XIII) में सरदार पटेल का इस मसले पर अपना रुख दर्ज है. इस पुस्तक के मुताबिक 17 दिसंबर 1949 के दिन सरदार पटेल ने जयपुर में कांग्रेस की बैठक में कहा कि अगर कोई संगठन राष्ट्रध्वज की जगह कोई और झंडा अपनाता है तो उसके साथ सख्ती से निपटा जाएगा.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक 1930 और 1940 के दशक में आरएसएस का शायद ही कोई कार्यकर्ता राष्ट्रध्वज को सलामी देता नजर आता था. उनकी निष्ठा अपने संप्रदाय से जुड़ी थी ना कि पूरे राष्ट्र से. ये लोग अपने भगवा ध्वज को तिरंगे से कहीं ऊपर फहराते थे . महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद इस आशय की बहुत सी खबरें आईं कि आरएसएस के कार्यकर्ता तिरंगे को अपने पैरों से कुचल रहे हैं . इससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बड़े आहत हुए.

24 फरवरी 1948 के अपने भाषण में नेहरू ने अफसोस भरे स्वर में कहा, ‘ कुछ जगहों पर आरएसएस के कार्यकर्ता राष्ट्रीय झंडे का अपमान कर रहे हैं. वे अच्छी तरह जानते हैं कि राष्ट्रध्वज का अपमान करके वे अपने को गद्दार साबित कर रहे हैं. …’.

याद कीजिए ठीक एक साल पहले आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने तिरंगे के बारे में क्या कहा था. मोहन भागवत के शब्द थे- ‘बीआर आंबेडकर का भी ख्याल था कि भगवा(आरएसएस का झंडा) को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए. दुर्भाग्य कहिए कि हम उनके विचारों का प्रचार-प्रसार ना कर सके.’ आरएसएस के प्रमुख ने यह बात कानपुर की एक बैठक में कही थी।

Source firstpost 👇

https://hindi.firstpost.com/india/mohan-bhagwat-defies-restraint-hoists-flag-in-kerala-school-why-rss-did-not-fly-tricolour-for-52-years-47929.html

ब्राह्मण राष्ट्र

भगवा ध्वज VS राष्ट्र ध्वज तिरंगा

आरएसएस संघ

तिरंगा अपमान

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या

विदेशी ब्राह्मण

मूलनिवासी (st, sc, obc)