बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने अपने लाखों साथियों के साथ हिंदू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाएं लेकर हिंदू धर्म और उसकी पूजा पद्धति को पूर्ण रूप से त्याग दिया था.
मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा.
मैं राम और कृष्ण को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा , और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा.
मैं गौरी, गणपति जैसे हिंदू धर्म के किसी देवी देवता को नहीं मानूंगा और न ही उनकी पूजा करूंगा.
ईश्वर ने कभी अवतार लिया है, इस पर मेरा विश्वास नहीं.
मैं ऐसा कभी नहीं मानूंगा कि तथागत बौद्ध विष्णु के अवतार हैं . ऐसे प्रचार को मैं पागलपन और झूठा समझता हूं.
मैं कभी श्राद्ध नहीं करूंगा और न ही पिंडदान करवाऊंगा.
मैं बौध धम्म के विरुद्ध कभी कोई आचरण नहीं करूंगा.
मैं कोई भी क्रिया-कर्म ब्राह्मणों के हाथों से नहीं करवाऊंगा.
मैं इस सिद्धांत को मानूंगा कि सभी इंसान एक समान हैं.
मैं समानता की स्थापना का यत्न करूंगा.
मैं बुद्ध के आष्टांग मार्ग का पूरी तरह पालन करूंगा.
मैं बुद्ध के द्वारा बताई हुई दस परिमिताओं का पूरा पालन करूंगा.
मैं प्राणी मात्र पर दया रखूंगा और उनका लालन-पालन करूंगा.
मैं चोरी नहीं करूंगा.
मैं झूठ नहीं बोलूंगा.
मैं व्याभिचार नहीं करूंगा.
मैं शराब नहीं पीऊंगा.
मैं अपने जीवन को बुद्ध धम्म के तीन तत्वों- प्रज्ञा, शील और करुणा पर ढालने का यत्न करूंगा.
मैं मानव मात्र के विकास के लिए हानिकारक और मनुष्य मात्र को उच्च-नीच मानने वाले अपने पुराने हिंदू धर्म को पूर्णत: त्यागता हूं और बुद्ध धम्म को स्वीकार करता हूं.
यह मेरा पूर्ण विश्वास है कि गौतम बुद्ध का धम्म ही सही धम्म है.
मैं यह मानता हूं कि अब मेरा नया जन्म हो गया है.
मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से मैं बुद्ध धम्म के अनुसार आचरण करूंगा
गुरु नानक जी ने क्यो किया ब्रह्मणो के जनेऊ प्रथा का विरोध 👇
गंगू ब्राह्मण का काला सच 👇
गुरु नानक के बारे में एक प्रसिद्ध कहानी है कि वो 11 साल की उम्र में ही विद्रोही हो गए थे. इस उम्र में हिन्दू लड़के पवित्र जनेऊ पहनना शुरू करते हैं, लेकिन गुरु नानक ने जनेऊ पहनने से इनकार कर दिया था .
उन्होंने कहा था कि लोगों को जनेऊ पहनने के मुक़ाबले अपने व्यक्तिगत गुणों को बढ़ाना चाहिए.
गुरु नानक जी ने बहुत छोटी आयु में यह समझ लिया था कि जातिप्रथा एक शोषणकारी व्यवस्था है। उस समय में जातिभेद चरम पर थाl ऐसे समय में गुरुनानक देव ने ऊँच-नीच को बढ़ावा देने वाली जातिभेद की दीवार को सिरे से ख़ारिज किया थाl उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया बल्कि पंडे-पुजारियों की भी आलोचना कीl
उस समय ब्राह्मणवाद को लताड़ने का साहस कबीर, रविदास, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी ही कर पा रहे थेl इसी का नतीजा था कि तमाम विरोध के बाद भी उन्होंने एक एससी(sc) वर्ग के व्यक्ति भाई लालो को अपना परम सहयोगी और मित्र चुना थाl
सिख धर्म में लंगर प्रथा जातिवाद खत्म करने के लिए ही शुरू की गई थी। ताकि सिख धर्म के सभी अनुयाइयों में बराबरी का एहसास हो और समानता की भावना मजबूत हो।
उनके दोहों में भी जातिभेद के विरोध की चेतना, मानवता, समानाता, आपसी भाईचारा और मानवप्रेम ही कलमबद्ध हुए हैं। उन्होंने कहा है-
“अव्वल अल्लाह नूर उपाया/कुदरत ते सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।”
गुरु नानक जी ने समस्त मानव जाति को एक ही कुदरत की संतान बताया और कहा कि एक ही पिता की संतान होने के बाद भला कोई ऊंच और कोई नीच कैसे हो सकता है।
वे कहते हैं –
‘ नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।’
यानी समाज में नीच जाति में भी जो सबसे ज्यादा नीच है,नानक उसके साथ खड़े हैं, बड़े लोगों के साथ मेरा क्या काम।
गुरुनानक ने न केवल जातिप्रथा का विरोध किया बल्कि वे समाज में प्रचलित सड़ी-गली मान्यताओं और कुरीतियों के भी घोर विरोधी रहेl
सिख गुरु गोबिन्द सिंह ने जातिवाद को खत्म करने के लिए अपने अनुयायियों को आदेश दिया था कि हर सिख पुरुष अपने नाम के आखिर में ‘सिंह’ लिखेगा तथा सिख महिलाएं ‘कौर’ लिखा करेंगीl लेकिन सिख धर्म को मानने वाले भी अपने गुरुओं की शिक्षाओं को भूल बैठे और ऊँच-नीच की भावना से बच नहीं सके। उन्होंने भी धीरे-धीरे ब्राह्मणवाद को अपना लियाl अब सिख अपने नाम के पीछे सेखों, खत्री, झंड , ढिल्लो, मेहता, भल्ला आदि सरनेम लगाकर खुद को तथाकथित ऊंच जाति की पृष्ठभूमि वाला, क्षत्रिय, जट आदि दिखने की अंधी होड़ में शामिल हो गए हैं। जो सच्चे सिख अनुयायी हैं वो आज भी जातिवाद को नहीं मानते।
गुरु ग्रन्थ साहिब में छुआछूत और उंच-नीच की जाति-पांति का कड़ा विरोध है. इस में सामाजिक-बराबरी और भाई-चारे का संदेश दिया गया है।
मूर्ति-पूजा, सती-प्रथा, कन्या-वध, पर्दा-प्रथा आदि का निषेध किया गया है।
गुरु ग्रन्थ साहिब में ईश्वर को निराकार,निरंजन, अकाल,अजन्मा और अविनाशी माना गया है.
गुरु का लंगर – सामाजिक गैर-बराबरी को ख़त्म करने के लिए लंगर की शुरुआत गुरु नानक ने की थी.यह व्यवस्था गुरु-दर-गुरु जारी रही और आज भी है. इसी लंगर से प्रभावित हो कर मुग़ल बादशाह अकबर ने कुछ गावं सिखों को जागीर में दिए थे जिस पर आज अमृतसर बसा है।
गुरुद्वारा आन्दोलन – आरम्भ में गुरुद्वारे भी हिन्दू मन्दिरों की तरह महंतों/पंडों की पैतृक सम्पत्ति समझे जाते थे. इसके विरोध में लम्बा आन्दोलन चला और गुरुद्वारों को सिक्ख संगत( समाज ) की सम्पत्ति बना दिया गया. इसके लिए निर्वाचित गुरुद्वारा प्रबंध समितियां बनायीं गयी।
ब्राह्मणवाद के विरुध्द जंग में गुरु नानक के साथ नीच करार की गयी जातियां चाहे हिन्दुओं में हो या मुसलमानों में, बराबर के साझीदार थी. मगर, बाद में हम देखते हैं कि जो जंग ब्राह्मणवाद के खिलाफ होनी थी, वह सिक्खों और मुसलमानों के बीच खड़ी हो गयी. मनुवादियों ने मुगलों के साथ रिश्ते जोड़ कर और गुरुओं पर हमले कर सिक्ख लहर को कमजोर किया.
गुरु अमरदास 3rd Guru : (1479-1574) – सिक्खों के गुरु अमरदास ने हिन्दू-कर्मकांड और देवी-देवताओं को मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने छुआछूत और सती-प्रथा का भी विरोध किया था. उन्होंने अपने शिष्यों को राम के स्थान पर ‘वाहे गुरु ‘ का उद्घोष करने को कहा था.
गुरु रामदास 4rth Guru : (1534-1574) – ये तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे. आपने हरमंदिर साहिब( स्वर्ण मन्दिर) की नीवं एक मुस्लिम संत मियां मीर से रखवाई थी. आपने हरमंदिर साहिब के चार दरवाजे रखवाए थे ताकि किसी भी जाति/ धर्म, समुदाय का व्यक्ति किसी भी दिशा से आ कर इबादत कर सके.
गुरु अर्जनदेव 5th Guru : (1563-1606) – गुरु रामदास के पुत्र गुरु अर्जनदेव ने पूर्व गुरुओं की वाणी को ‘आदि ग्रन्थ’ के रूप में संकलित किया था. गुरु रामदास की हत्या लाहौर के ब्राह्मण राजा चंदूशाह ने करवाई थी.
गुरु तेग बहादुर 6th Guru : (1621-1675) –
कश्मीरी पंडितों ने औरंगजेब के आतंक से निजात पाने के लिए गुरु तेग बहादूर से गुहार की थी. इस से मुग़ल बादशाह औरंगजेब खपा थे. औरंगजेब ने उन्हें कैद कर बाद में हत्या करवा दी थी.दिल्ली के चांदनी चौक का गुरुद्वारा सिस गंज साहिब उनकी स्मृति में बनाया गया है जहाँ उनकी हत्या की गयी थी. गुर तेग बहादूर ने सन 1665 में आनंदपुर साहिब शहर बसाया था.
अंग्रेजों ने हम मूलनिवासियो (ST, SC, OBC) के लिए क्या क्या किया?
✍✍ देवदासी प्रथा अंग्रेजों ने ही बंद कराई इस प्रथा में यह होता था कि शूद्र ( ST , SC, OBC )समाज की लडकिया मंदिरों में देवदासी के रूप में रहती थी और ब्राह्मण उनसे जो बच्चा पैदा करता था उसे हरिजन कहते थे इसीलिए हरिजन एक गाली है। पर आज भी भारत के कुछ हिस्सों में ये प्रथा ब्रह्मणो द्वारा जारी है।
:✍✍ सन 1919 ईस्वी में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनने पर रोक लगा दी थी अंग्रेजों ने कहा था कि इनका चरित्र न्यायिक नहीं होता है।
✍✍ चरक पूजा अंग्रेजों ने 1863 ईस्वी में बंद कराई इसमें यह होता था कि कोई पुल या भवन बनने पर शूद्रों शूद्र ( ST , SC, OBC ) की बलि दी जाती थी।
✍✍ शासन व्यवस्था पर ब्राह्मणों का 100% कब्जा था अंग्रेजों ने इन्हें 2.5% पर लाकर खड़ा कर दिया था।
✍✍ शूद्रों (obc.sc.st) को अंग्रेजों ने 1835 ईस्वी में कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया था इससे पहले शूद्र( ST , SC, OBC ) कुर्सी पर नहीं बैठ सकते थे।
✍️✍️ क्या आप लोग जानते हैं अंग्रेजों ने अधिनियम 11 के तहत शूद्रों को (ST , SC, OBC ) 1795 ईस्वी में संपत्ति रखने का अधिकार दिया था।
✍️✍️ क्या आप लोग जानते हैं अंग्रेजों ने शूद्रों (obc,sc,st) को 1813 ई० शिक्षा का अधिकार दिया था।
✍️✍️ ब्राह्मण शूद्रों ( ST , SC, OBC ). का पहला लड़का गंगा में दान करवा दिया करते थे क्योंकि वह जानते थे कि पहला बच्चा हष्ट पुष्ट होता है इसीलिए उसको गंगा में दान करवा दिया करते थे अंग्रेजों ने इस प्रथा को रोकने के लिए 1835 में एक कानून बनाया था।
✍️✍️ बाबा साहब के प्रयासों द्वारा शुद्रो ( ST , SC, OBC ) को 1927 में सार्वजनिक जगहों पर जाने का हक मिला था ।
✍️✍ नरबलि जोकि शूद्रों (ST, SC, OBC ) की दी जाती थी अंग्रेजों ने इसे रोकने के लिए 1830 में कानून बनाया था।
✍️✍ सन 1819 से पहले किसी शूद्र ( ST , SC, OBC ) की शादी होती थी तो ब्राह्मण उसके दुल्हन का शुद्धीकरण करके 3 दिन अपने पास रखते थे उसके उपरांत उसको घर भेजते थे इस प्रथा को अंग्रेजों ने 1819 ईस्वी में बंद करवाया।
RSS के मोहन भागवत को वामन मेश्राम ने दी खुली चुनौती SC ST OBC को हिंदू साबित करके दिखाओ 👇
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दस का शासन 90 पर नहीं चलेगा – By Arun Kr Gupta’s Heart Touching Speech 👇
क्या आर्यभट्ट (ब्राह्मण) ने किया शून्य(zero) का आविष्कार????
जब जीरो दिया मेरे भारत ने…’ पूरब और पश्चिम फिल्म का महेंद्र कपूर का ये गीत काफी लोकप्रिय रहा है। शून्य…”
शून्य की खोज भारतीय उपमहाद्वीप में हुई, इस बात को पूरी दुनिया मानती है। लेकिन शून्य का उपयोग कब से होता आ रहा है, इस बारे में नए तथ्य सामने आए हैं , जिसके आधार पर तीसरी सदी में जीरो के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। अगर वाकई ऐसा है तो मानना पड़ेगा कि आर्य भट्ट से पहले भी जीरो का इस्तेमाल हो रहा था।
सन 1881 में पेशावर के पास एक गांव की खुदाई में बख्शाली की पांडुलिपि मिली थी, जिनमें शून्य का उल्लेख मिलता है। 1902 से ही यह पांडुलिपी ब्रिटेन के बोडलीयन लाइब्रेरी में सुरक्षित है। अब तक माना जाता था बख्शाली पांडुलिपि सातवीं या आठवी सदी की हैं, लेकिन ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने कार्बन डेटिंग के जरिए पता लगाया है कि यह पांडुलिपि जितनी पुरानी मानी जाती थी, उससे करीब 500 साल ज्यादा पुरानी है।
अब तक जीरो की खोज का श्रेय आर्य भट्ट को दिया जाता है जिनका जन्म 476 ईसवीं में हुआ था। अगर बख्शाली पांडुलिपि की कार्बन डेटिंग से प्राप्त तथ्यों पर गौर करें तो अनुमान लगाया जा सकता है कि आर्य भट्ट से पहले तीसरी सदी के आसपास भी भारतीयों को जीरो की समझ थी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर मारकुस डू सॉटॉय का कहना है कि कार्बन डेटिंग के मुताबिक यह पांडुलिपि दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच की है, जिसमें सैकड़ों शून्य हैं।
जनेऊ एक धार्मिक अनुष्ठान है। जिसको ब्राह्मण अपनी उच्चता और श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में लहराते है।
ब्राह्मण अपनी माँ बहन और बेटी को भी जनेऊ नहीं पहनाता ।वामन मेश्राम 👇
इक्कीसवीं शताब्दी में यह जनेऊ सामाजिक विषमता और भेदभाव का सब से ज्यादा प्रकट प्रतीक है। जनेऊ नहीं होगा, तो ब्राह्मण या ठाकुर को पहचाना कैसे जायेगा?
दुनिया में लोग अपने प्रयत्नों से श्रेष्ठता अर्जित करते हैं, पर हिंदू समाज में यह जन्म से ही उपार्जित हो जाती है। ब्राह्मण का बच्चा है तो वह स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ है, भले ही आगे चल कर वह अनपढ़, मूर्ख, असभ्य और दुष्ट निकले। श्रेष्ठता का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है?
इसी अर्थ में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि हिंदू समाज समाज नहीं, जातियों का समूह है। यह वह व्यवस्था है जिसमें बीस प्रतिशत से भी कम लोगों ने अपने को श्रेष्ठ और जनेऊ धारण करने का अधिकारी घोषित कर रखा है और बाकी अस्सी प्रतिशत को जन्म से ही हीन घोषित कर दिया है।
अपने विख्यात भाषण ‘जाति का विनाश ’ में डॉ. आंबेडकर कई उदाहरण देते हैं। एक उदाहरण यह है : ‘मराठों के देश में, ब्राह्मण पेशवाओं के शासन काल में अछूत को उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी जिस पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो, ताकि अछूत की छाया पड़ने से ब्राह्मण अपवित्र न हो जाये । उसके लिए आदेश था कि वह एक चिह्न या निशानी के तौर पर अछूत अपनी कलाई में या गले में काला धागा बाँधे रहे , ताकि कोई ब्राह्मण गलती से उससे छू जाने पर अपवित्र न हो जाये। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूत के लिए यह आदेश था कि अछूत कमर में झाड़ू बाँध कर चले, ताकि वह जिस मिट्टी पर पैर रखे, वह उसके पीछे से काम कर रहे इस झाड़ू से साफ हो जाये, ताकि उस मिट्टी पर पैर रखने से कोई ब्राह्मण अपवित्र न हो जाये। पूना में, अछूत के लिए जरूरी था कि वह जहाँ भी जाये, सभी अछूत अपने गले में मिट्टी की हाँड़ी बाँध कर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूके, ताकि जमीन पर पड़ी हुई अछूत की थूक पर अनजाने में किसी हिंदू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र न हो जाये।’